अपेक्षा

परिचय

यह तीन अक्षरों का शब्द जीवन में मुझे कैसे नचाता है और इसकी ग़ुलामी का अंजाम क्या होता है ? क्या जीवन में हमें भुगतना पड़ता है । इसको जब अनुभव किया तब अचानक मुझे महावतार बाबाजी की प्रेरणा से माँ सरस्वती ,यह पुस्तक लिखा रही है।

एक बार सूर्य ध्यान साधना के सत्र में सनयोगी उमाशकंर जी बता रहे थे कि जब हम कोई क्रिया बिना किसी अपेक्षा , प्रेम से व दोस्ती से करते हैं तो एक ऊर्जा का त्रिकोण निर्माण होता है व उससे ओर कई द्रष्टीकौण बनते है।

जब इसका अभ्यास प्रति दिन करने लगी तो
मुझे अपने पूर्व जीवन में अपनी बाल्यावस्था से
लेकर आज तक की घटनाओं पर आत्म चिन्तन
करने का मौक़ा माला
अहसास कर पा रही थी कि मेरे जीवन में हर रिश्ते में ,
हर घटना में व हर क्षेत्र में त्रिकोण🔺
के ये तीन सोपान प्रेम , दोस्ती या अपेक्षा में ज़्यादातर सभी जगह अपेक्षा मौजूद रही । कहीं कहीं प्रेम नहीं था कार्य के प्रति या कहीं दोस्ती नहीं थी कार्य के प्रति ।
इसलिये जीवन में , दुख , असफलता या दूसरों पर अपनी कमजोरी का दोष लगा देना यह सीख गयी।
कभी इस आत्म चिन्तन को नहीं किया कि मैंने त्रिकोण को कभी पूरा ही नहीं किया ।
उसका कोई न कोई हिस्सा खुला रहा तो जो कोण बनना था वो कभी पूरा नहीं बना । ज़िन्दगी इसलिये अधूरी सी लगती थी ।
आज इसके बारे में विस्तार से जब जहां से मेरे जीवन की घटनाओं को साझा कर रही हूँ । समझ आने के बाद हर घटना में सभी के साथ प्रेम , दोस्ती , मेरी अपेक्षा को हटा कर समर्पण के साथ उन घटनाओं को त्रिकोण का रूप देकर पूर्ण कर रही हूँ ।
यह पुस्तक बाबाजी को समर्पित कर रही हूँ

याद आता है जब मैं तीन वर्ष की थी । मेरे पिताजी का तबादला जयपुर से पंजाब ( फ़रीदकोट) हो गया ।
जहां हमारे घर में एक बड़ी मेज़ थी व उस पर चड कर चलना शुरू कर देती ओर वो कब समाप्त हो जायेगी पता नहीं होता था और मैं गिर जाती थी । यहाँ तक डर क्या होता है मैं नहीं जानती थी ।
फिर एक दिन मेरी बड़ी बहन को हमारे सामने बंगले के यहाँ एक पामेिरयन कुत्ते ने काट लिया । यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा डर बन गया ।
मैं किसी भी उस व्यक्ति के घर नहीं जाती जो कुत्ते पालते हैं या उनसे दोस्ती ही नहीं करती ।
मेरी शादी के बाद मेरी बेटी के साथ यही घटना उसके बचपन में घटी , मेरे पुत्र को कुत्ते ने काट लिया व अब मेरी बेटी मुझसे ज़्यादा कुत्ते से डरती है।
लाख कोशीस करने पर भी मेरे शरीर से यह डर अलग नहीं हो पाता । यह डर मुझे केवल पालतू कुत्ते से होता है ।सड़क पर बैठे कुत्ते बिलकुल शातं व मैं आराम से उनके पास से निकल जाती हूँ ।
एक दिन मैं मम्मी के साथ किसी रिश्तेदार के घर गयी थी । जहां हम बैठे थे वहाँ उसके नीचे कुत्ते भी है यह मुझे पता नहीं था , अचानक वो बाहर आ गये और मेरा हाल डरके मारे एसा कि उनकी बालकनी से कूदने को तैयार हो गयी , फिर किसी ने उनको पकड़ा व मेरा रोना व चिल्लाना दोनों जौर से चालू था व भाग कर सड़क पर आ गयी ओर मम्मी को मुझे लेकर घर आना पड़ा ।
मेरी साँसों को संयत होते होते कई घंटे लग गये ।

बस अब यंहा से डर कर मेरा जीवन शुरू होता है।

मेरे पिता बहुत ग़ुस्से वाले थे । मुझे उनके प्यार की कोइ झलक याद नहीं है।
घर का माहौल हमेशा तनाव पूर्ण रहता था ।
अक्सर अपनी नानी के घर रहने चली जाती ।
कोइ कई दिन घर नहीं आती व स्कूल जाना नहीं अच्छा लगता ।

जब वापस आती स्कूल जाती तो मुझे कुछ समझ नहीं आता । मुझे ब्लैक बोर्ड पर लिखा समझ नहीं आता व
मै आख़िर वाली बैचं पर बैठती थी । मेरे गणित में बहुत कम नम्बर आते थे । धीरे धीरे गणित में कमजोर होती गयी ।
गणीत में हमेशा मुझे डाँटा जाने लगा ।
मैंने घर में बहुत बार बताने की कोशीस की , मुझे चश्मा
लगना चाहिए । पर घर पर मेरी बात कोई नहीं मानने
को तैयार नहीं हुआ व मै बस पास भर हो जाती थी ।

जब मैं कालेज के दूसरे वर्ष में थी अचानक मुझे सिर दर्द रहने लगा आँखें सूज जाती । इस बार मेरी मम्मी ने मेरी बात को गंभीरता से लिया व मुझे चश्मा लगा । अब
मुझे सब साफ़ दिखाई देता था ।

कालेज में तो नहीं पर विश्वविद्यालय में पहली बार मैंने एम ए में प्रथम स्थान जैसे नम्बर प्राप्त किये ।

मै छोटी उम्र से जयपुर रेडियो स्टेशन में युवा वाणी कार्यक्रम मे वक़्ता थी ।
वहाँ जो आफ़िसर थे हमेशा कहते थे कि तुम दिल्ली से
अपना एक आडीशन टेस्ट करवा लो । उन दिनों यह केवल दिल्ली में ही होता । पर मेरे पिताजी ने कहा रेडियो की नौकरी लड़कियों के लिये ठीक नहीं
ओर मैंने अपनी उस चाहत को हमेशा के लिये खो दिया ।

शादी के बाद मैं बॉम्बे आ गई पर यंहां भी मेरे घर से रेडियो स्टेशन दूर था ओर यहाँ की मुझे जानकारी नहीं थी व अकेले कहीं जाने आने को डरती थी ।

बच्चे जब मेरी ज़िन्दगी में आ गये तो सोचा इन्हीं को सब कुछ वो मौक़ा देंगे जो मुझे नहीं मिला ।
पर सब आपके अनुकूल हो ज़िन्दगी उसे नहीं कहते ।

अचानक एक दिन मेरी लड़की ने बताया कि टीचर ने यह काग़ज़ दिया । आज शाम को एक गुरूजी का प्रोग्राम है ।
यह सिद्ध समाधि योग के गुरूजी ऋषि प्रभाकरजी
का कार्यक्रम था और उनके ओम से प्रभावित होकर
मैंने इस प्रोग्राम को किया ।
इसका परिणाम यह हुआ कि मेरी नाक जो हमेशा बंद रहती थी खुल गयी । ध्यान को सिखा , अन्न मय कोष को जाना ।
आगे चल कर संस्था में एक पैरनटीग कोर्स में टेनर हो गयी । जहां सीख भी रही थी ओर सीखा भी रही थी ।

यहाँ अगर सच्चे दिल से कहूँ तो कुछ न कुछ अपेक्षा और शिकायत दोनो थे ।
लिखने से ज़्यादा सिखाने की जल्दी थी ।
संस्था में कई स्तर थे । न जाने कब उस होड़ में अपने
आपको शामिल कर लिया । मगर जल्दी ही मुझे
महसूस हुआ यह मेरा उद्देश्य नहीं और आध्यात्मिक
मार्ग तो दिव्यता का मार्ग है । मैं यह किस उलझन में उलझ रही हूँ ।
पीरामीड ध्यान विधी सीखी हासपीट में स्वामी शान्ताराज जी के साथ । कई साल उनसे मार्ग दर्शन लिया व फिर उन्होंने
भी संन्यास ले लिया ।
इस बीच गूरू जी शरीर छोड़ चुके थे संस्था का माहौल बिगड़ने लगा था ।
मेरे पति ओशो के साथ रहे उनके शिष्य माँ बाबा के ओंकार ध्यान प्रोग्राम में जाते थे ।
मैं भी ध्यान के लिये उसमें जाने लगी ।
विपशना ध्यान इगतपूरी में भी तीन चार बार किया ।
पर जब सनयोगी जी के सानिध्य में त्रिकोण
को जाना और समझा तो महसूस होने लगा कि मैं यही
डूड रही थी ।
सभी अपेक्षायें छूट चूकी थी व जो त्रिकोण
मैंने जीवन में अधूरे छोड़ रखे थे अब मैं उनको
ध्यान के द्वारा अपना प्रेम भेज कर , क्षमा माँग कर
अपने उन अधूरे त्रिकोण को पूरा कर रही हूँ
जो कभी मैंने जाने अनजाने में पूरे नहीं किये थे ।
जीवन में मै कोन हूँ ? यह जानना कितना ज़रूरी है ।
वरना हम बाहरी जगत की इस भाग दौड़ में उलझ कर फिर एक जन्म ओर एक जन्म लेकर आते रहेंगे
पर यह नहीं जान पायेंगे कि मै कौन हूँ ।
जब तक हमें इसका खुद को अनुभव नहीं होता
तब तक उसका आनन्द हमारा एक स्वप्न है।
जानने के बाद हम कोई विशेष नहीं बन जाते ,
अब हर एक में जो मेरे भीतर है वो ही नज़र आता है ओर “मै” का अहंकार खोने
लग जाता है।
मैं जब तक खुद को विशेष मानती रही ,
मैंने यह किया , मेरे साथ उसने एसा किया ,
हर वक़्त मन में , ग़ुस्सा , दुख व शिकायतों का ताना बाना बुनती रहती , उसके पास जाने नहीं देता था जहां अपनी रूह है, जहां एक सुकून है,जहां एक संगीत है।

द्वाराहाट की अद्भुत और चमत्कारिक यात्रा।

बाबाजी की गुफाएँ मेरे सपनों की मंजिल थीं।
हम कभी अकेले भी जा सकते हैं सोचा नहीं था।
लेकिन मेरे सभी गुरू जनो को धन्यवाद और आभार जिन्होंने मुझे प्रशिक्षित किया और यह विश्वास दिलाया कि कोई भी मौन धारण कर सकता है और हर एक को अवश्य जाना चाहिए।

बरसात के मौसम में उत्तराखंड का सौन्दर्य अप्रत्याशित है। हम गुरु पूर्णिमा के समय गुफा में पहुँचना चाहते थे और ऐसे में हर तरफ़ बारिश और हवाई यात्रा समय अनुसार नहीं थी

स्थानीय लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात थी कि मुंबई से अकेले और बंग्लोर से मेरी सह यात्री हम द्वाराहाट पहुंचे। तीन व्यक्तियों ने इसे संभव बनाया, एक श्री नेगी, (ब्रह्मा, )दूसरा सगत (विष्णु, )तीसरा शंकरजी हैं, जिन्होंने हमें गुफाओं तक मार्गदर्शन दिया। हर समय चढ़ते समय वे मेरा हाथ पकड़े रहे थे और मुझे लगा कि बाबाजी मेरा हाथ पकड़ रहे हैं।

गंध, नाद (ध्वनि) और ऊर्जा अद्भुत था। ध्यान करने की जरूरत नहीं है। आप हर समय ध्यान की स्थिति में होते हैं और सिर्फ जागृति में होते हैं और प्रकृति के साथ एकता में हो सकते हैं।

जिन्होंने हमें अपना नाम शंकर बताया था वो निचे पहुँचे और हमें जैसे ही मुंडे देखा तो ग़ायब हो गये । तब अहसास हुआ कि वे स्वयं बाबाजी थे । रास्ते में कभी
एक वाक्य भी नहीं बात कि ।
जैसे बाबाजी के बारे में सुना था वे किसी भी शरीर में प्रविष्ट कर आपके साथ होते हैं और हमें पता भी नहीं चलता वे मदद कर चले जाता है ।
बारिश इतनी तेज थी कि सड़क के दोनो साइड की
खाइयाँ नज़र नहीं आती थी । जीप के आगे की हेडलाइट से सिर्फ़ ज़रा सी सड़क नज़र आती थी ।
अचरज से हम आकाश में सूर्य निकला है उसको देख
रहे थे । आश्चर्य जनक था कि पूर्णिमा का चादं इतनी बारिश में वो भी सुनहरा ।
नीचे होटल में आने पर हमें पता चला कि वही तो बाबाजी का दर्शन था । हम गुफा में नहीं जा सके तो
वो बाहर आकाश में हमें दर्शन दे रहे थे ।

हमें पता चला कि कोई भी शरीर ३.३० के बाद गुफाओं में नहीं जाता है, लेकिन हमने तो चलना ही ५. ३० से शुरू किया। उस अवधि के दौरान बारिश पूरी तरह से रुक गई थी।

जिस पल हम नीचे आए और जीप में फिर से बारिश शुरू हो गई थी।

नैनीताल की पूरी सुंदरता द्वाराहाट हमारे लिए ग्रीन कार्पेट की तरह है।

हमने होटल मयंक में रात्रि विश्राम किया। और अगले दिन 5 बजे सुबह द्वाराहाट से पंतनगर हवाई अड्डे की यात्रा शुरू की ।
बाबाजी के आशीर्वाद के कारण हमारी यात्रा खुश चमत्कारिक ढंग से पूर्ण हूयी । श्रद्धा और सबौरी जीवन में इतनी आवश्यक है। और वे दो हैं, जो हमारे जीवन की यात्रा को खुशहाल, रोमांच और साहसी बनाते हैं।

हमने सुबह 4 बजे मुंबई से शुरू किया और 5. 30 बजे द्वाराहाट पहूचे । हमारी दिल्ली से पंतनगर के लिए उड़ान में देरी हो रही थी अन्यथा हम 3 तक तक पहुँच सकते थे।
केवल हमें ध्यान रखना है कि कम भोजन ले व केवल फल खाएं। क्योंकि पहाड़ की यात्रा है। हमने कुछ नहीं खाया था।

अगर आपने बहुत सारा पका हुआ खाना खा लिया है तो आप उल्टी महसूस कर सकते हैं। लेकिन अगर आपका पेट खाली है तो आप ताजी हवा और बहुत अधिक ऊर्जा लेंगे ।

सड़कें इतनी चिकनी हैं। हर समय फ़ोन उपलब्ध था
अब पूरे भारत में सड़क वायु और फोन द्वारा कनेक्टिविट हैं ।
महावतार बाबाजी के यहाँ से लौटने पर मुझे सनयोगी
उमाशंकर जी का मार्ग दर्शन मिला ओर उन्हीं से सनयोगा सीखा।
यह भी पता चला कि सनयोगा सन मैडिटेशन नहीं है।
दोनों में फ़र्क़ है।